केंद्र सरकार ने विदेशी फंड लेने वाले गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के लिए नियम और सख्त कर दिए हैं। Foreign Contribution (Regulation) Rules में किए गए नए बदलावों के बाद अब NGOs के लिए काम करना पहले से ज्यादा नियमों के दायरे में आ गया है। सरकार का कहना है कि इससे पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी, लेकिन कई संगठनों को इससे परेशानी भी हो सकती है।
नई दिल्ली: भारत में NGOs द्वारा विदेश से मिलने वाले फंड को Foreign Contribution (Regulation) Act यानी FCRA के तहत नियंत्रित किया जाता है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी पैसा देश के हित और कानून के अनुसार ही इस्तेमाल हो।
जून 2026 में गृह मंत्रालय ने FCRA Rules, 2010 में कुछ बड़े बदलाव किए हैं। इन नए नियमों के बाद NGOs के रजिस्ट्रेशन, काम करने के तरीके और रिपोर्टिंग की प्रक्रिया और ज्यादा सख्त हो गई है।
FCRA क्या है और क्यों जरूरी है
FCRA कानून पहली बार 1976 में लागू हुआ था, ताकि विदेशी फंड पर नजर रखी जा सके। बाद में इसे बदलकर 2010 में नया कानून लाया गया और फिर 2020 और 2026 में इसमें संशोधन किए गए।
इस कानून का मुख्य उद्देश्य है:
- विदेशी फंड का सही उपयोग सुनिश्चित करना
- देश की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना
- NGOs के काम में पारदर्शिता लाना
FCRA के तहत रजिस्ट्रेशन आमतौर पर 5 साल के लिए होता है और समय पर इसे रिन्यू कराना जरूरी होता है। कुछ लोगों और संस्थाओं जैसे राजनीतिक दल, सरकारी कर्मचारी आदि को विदेशी फंड लेने की अनुमति नहीं होती।
नए नियमों से क्या बदला
1. काम की सीमाएं तय
अब NGOs को 5 तय श्रेणियों—सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक और धार्मिक—में से एक चुननी होगी। वे उसी के अनुसार ही काम कर पाएंगे। इससे सरकार के लिए उनकी गतिविधियों पर नजर रखना आसान होगा।
2. ज्यादा जानकारी देना जरूरी
अब NGOs को अपनी वेबसाइट, सोशल मीडिया, काम का क्षेत्र और गतिविधियों की पूरी जानकारी देना अनिवार्य होगा। अलग-अलग राज्यों के लिए अलग रजिस्ट्रेशन और फीस की व्यवस्था भी की गई है।
3. पदाधिकारियों पर सख्ती
अब “प्रमुख पदाधिकारी” की परिभाषा बढ़ा दी गई है, जिसमें ट्रस्टी, पार्टनर और मैनेजमेंट से जुड़े लोग शामिल हैं। अगर संगठन में विदेशी नागरिक शामिल हैं, तो उन्हें FCRA अनुमति मिलने में मुश्किल हो सकती है, जब तक सरकार से खास अनुमति न मिले।
आलोचना भी हो रही है
कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन नए नियमों से छोटे NGOs पर ज्यादा असर पड़ सकता है। आलोचकों का कहना है कि इससे कई छोटे संगठन बंद भी हो सकते हैं और सामाजिक काम करने में दिक्कत आ सकती है।
संतुलन जरूरी
सरकार का कहना है कि ये बदलाव देश की सुरक्षा और पारदर्शिता के लिए जरूरी हैं। वहीं, कई सामाजिक संगठन मानते हैं कि इससे उनके काम पर दबाव बढ़ेगा।
आखिरकार, इन नियमों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इन्हें कितनी निष्पक्षता और संतुलन के साथ लागू किया जाता है—ताकि देश की सुरक्षा भी बनी रहे और समाज के लिए काम करने वाले संगठनों को भी सही माहौल मिल सके।
